चिंतनीय: केवल 41.1% हिमाचली माताएं कराती हैं पहले घंटे में स्तनपान

यह आंकड़ा भारत के ३६ राज्यों एवं केंद्र शासित राज्यों की सूची में हिमाचल को 25वें स्थान पर बैठा लेता है।

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हर पहलू में आगे रहने वाला राज्य एक आंकड़े में पिछड़ा हुआ प्रतीत होता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 4 (2015-16) के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में केवल 41.1% बच्चों को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया जाता है।

हाल ही में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्‍य मंत्री, श्री अश्‍विनी कुमार चौबे ने लोकसभा में पूरे देश के आंकड़ों का खुलासा किया। देखा जाए तो हिमाचल का आंकड़ा पूरे देश की दर — 41.6% से ज़्यादा बुरा नहीं है। परन्तु, यह आंकड़ा भारत के ३६ राज्यों एवं केंद्र शासित राज्यों में इस सूची में हिमाचल को 25वें स्थान पर बैठा लेता है। यह आंकड़ा अति चिंता जनक है। अगर हम हिमाचल की तुलना इस सूची में पहले पांच राज्यों के आंकड़ों से करें तो हम काफी पिछड़े नज़र आते हैं। इस तालिका में प्रथम स्थान पर गोवा है जहाँ पर 73.3% बच्चों को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया जाता है। उत्तर-पूर्वी राज्य जैसे मिजोरम, सिक्किम, और मणिपुर जिनकी भौगोलिक स्थिति हिमाचल से भिन्न नहीं है, वे भी हिमाचल से काफी आगे हैं।

हालाँकि हम अपने पड़ोसी राज्यों पंजाब (30.7%) और उत्तराखंड (27.8%) से आगे हैं, पर यह कोई गर्व का विषय नहीं है। राष्ट्रीय तालिका में उत्तर प्रदेश 25.2% के आंकड़े लिए सबसे नीचे है।

क्रम सं. राज्य / संघ राज्य क्षेत्र जन्म के एक घंटे के भीतर तीन वर्ष से कम आयु के बच्चों को स्तनपान कराना (%)
1 गोवा 73.3
2 मिजोरम 70.2
3 ओडिशा 68.6
4 सिक्किम 66.5
5 मणिपुर 65.4
6 पुद्दुचेरी 65.3
7 असम 64.4
8 केरल 64.3
9 मेघालय 60.6
10 अरुणाचल प्रदेश 58.7
11 महाराष्ट्र 57.5
12 कर्नाटक 56.4
13 दमन और दीव 55.8
14 तमिलनाडु 54.7
15 लक्षद्वीप 54.3
16 नगालैंड 53.2
17 गुजरात 50
18 दादरा और नगर हवेली 47.8
19 पश्चिम बंगाल 47.5
20 छत्तीसगढ़ 47.1
21 जम्मू और कश्मीर 46
22 त्रिपुरा 44.4
23 हरियाणा 42.4
24 अंडमान व नोकोबार द्वीप समूह 41.9
25 हिमाचल प्रदेश 41.1
26 आंध्र प्रदेश 40.1
27 तेलंगाना 37.1
28 बिहार 34.9
29 मध्य प्रदेश 34.5
30 चंडीगढ़ 33.5
31 झारखंड 33.2
32 पंजाब 30.7
33 दिल्ली 29.1
34 राजस्थान 28.4
35 उत्तराखंड 27.8
36 उत्तर प्रदेश 25.2
नोटः- सर्वेक्षण से पूर्व पांच वर्ष के दौरान अंतिम पैदा बच्चे पर आधारित
स्रोतः एनएफएचएस 4 (2015-16) तथ्य पत्रक

ऐसा नहीं है कि हिमाचल एक पिछड़ा राज्य है या यहाँ कोई जागरूकता की कमी है। भारतीय मानव विकास रिपोर्ट 2011 के अनुसार हिमाचल प्रदेश मानव विकास सूची में केरल और दिल्ली से पीछे तीसरा स्थान पर है। राज्य में महिला से पुरुष का अनुपात (974) भी राष्ट्रीय औसत — प्रति 1,000 पुरुषों में 940 महिलाओं — से बेहतर है। विकास कार्यक्रम भागीदारी मानक में भी हिमाचली महिलाएं आगे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 3 के अनुसार हिमाचल में 65% शहरी महिलाएं और 56% ग्रामीण महिलाएं घरेलू निर्णयों में भाग लेती हैं।

तो फिर क्यों जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान के आकंड़े में हम पीछे रह गए हैं? इसका जवाब शायद सरकारी अफसरों के पास भी नहीं है। हिमवाणी ने जितने भी अफसरों से बात की, उनके लिए ये आंकड़ा अविश्वसनीय था।

राज्य महिला एवं बाल विकास विभाग के अपर निदेशक दिलीप नेगी इन आंकड़ों को देख कर चिंतित नज़र आये। उन्होंने कहा, “हिमाचल जैसे विकसित प्रदेश में इन आंकड़ों का आना हैरानी की बात है।”

उन्होंने बताया कि हिमाचल में महिला एवं बाल विकास निदेशालय और स्वस्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर स्तनपान जागरूकता अभियान कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिसमें अगस्त के पहले सप्ताह को विश्व स्तनपान सप्ताह के रूप में भी मनाया जाता है। मुख्यमंत्री बाल उद्धार योजना, आँगनवाड़ी द्वारा भी बच्चों की सेहत व स्तनपान जागरूकता के प्रति कई प्रकार के अभियान चलाए जाते हैं।

शिमला के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ संजय गुलाटी से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि हिमाचल में जन्म से एक घंटे के भीतर स्तनपान के ऐसे आंकड़े आना बहुत ही दुर्भाग्य की बात है। उन्होंने कहा:

“जन्म के तुरंत बाद बच्चे को माँ का पहला पीला गाढ़ा दूध मिलना बहुत ही जरूरी है। इस दूध से ही बच्चे को सभी प्रकार के उपयोगी पोषक तत्व प्राप्त होते हैं, जो नवजात को सभी प्रकार के संक्रमणों से बचाने में मदद करते हैं।”

डॉ गुलाटी ने ये भी बताया कि जिन बच्चों नियमित रूप से स्तनपान कराया गया हो, उन में मोटापा, अस्थमा, कुपोषण के कम मामले देखे गये हैं। साथ ही बच्चे मानसिक रूप से भी मजबूत देखे जाते हैं।

दूसरी तरफ इंदिरा गाँधी मेडिकल कॉलेज के डॉ श्याम कौशिक भी डॉ गुलाटी की बातों से सहमत हैं। उनके अनुसार “शिशु को पहले आधे घंटे में स्तनपान करना बहुत जरूरी है। अगर बच्चे को तुरंत ही स्तनपान नही कराया जाता है तो नवजात बच्चे के खून में शुगर का स्तर कम हो सकता है। हमारा दिमाग शुगर पर आश्रित होता है और अगर बच्चे को यह न मिले तो बच्चा सुस्त हो सकता है, साँस रुक सकती है और दौरा भी पड़ सकता है।”

डॉ कौशिक ने आगे बताया, “माँ का दूध बच्चे को कई तरह के संक्रमणों से बचने मैं मदद करता है और आम तौर पर देखा गया है कि शिशु मृत्यु मुख्य रूप से संक्रमणों की वजह से होती है; और यह सबसे ज्यादा 1 से 2 महीने के बच्चों में होती है। साथ ही निमोनिया, डायरिया, खसरा आदि से भी बच्चों की मृत्यु देखी गयी है। इन सभी बीमारियों को स्तनपान से काबू में लाया जा सकता है और जन्म के तुरंत बाद बच्चे को माँ का दूध अमृत समान होता है।”

यूँ तो हिमाचल ने 5 साल से नीचे (U5) के शिशु मृत्यु दर में काफी काबू पाया है, जो नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2011 में 46 थी, वो 2015 में घट कर 32 पहुँच गयी थी। 2011 में लड़कों की शिशु मृत्यु दर 43 थी और लड़कियों की 49 । ये दर 2015 में घट कर क्रमशः 28 और 38 रह गयी थी। सोचने वाली बात है कि जिस रफ़्तार से U5 लड़कों की मृत्यु दर घटी है, उस रफ़्तार से U5 लड़कियों की क्यों नहीं? कहीं लड़कियों को स्तनपान कराने में प्राथमिकता न देना इसका कारण तो नहीं?

राज्य महिला एवं बाल विकास विभाग के दिलीप नेगी ने बताया कि हिमाचल सरकार द्वारा कन्याओं के लिए भी कई प्रकार की योजनाएँ सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं, जिसमे कि हिमाचल की मुस्कान, बेटी है अनमोल योजना, प्रदेश बालिका सुरक्षा योजना प्रमुख हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार द्वारा ‘माँ’ (MAA: Mother’s Absolute Affection) कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस अभियान के तहत स्तनपान के लिए माताओं को प्रेरित किया जाता है। केंद्रीय सरकार इस कार्यक्रम के लिए स्वास्थ्य विभाग को हर ज़िले के हिसाब से 4 लाख 30 हजार रुपए दे रहा है । इस कार्यक्रम में आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) कर्मी प्रमुख किरदार निभा रही हैं।

परन्तु हिमाचल में पहले घंटे में स्तनपान न कराने के क्या कारण हो सकते हैं? डॉ गुलाटी का कहना है:

“कुछ मौकों पर यह भी सम्भव है कि बच्चे के जन्म के तुरंत बाद माँ की हालत ठीक न हो या माँ का ओपरेशन हुआ हो। कभी-कभी स्तन तुरंत दुग्धपान कराने की स्थिति में भी नहीं हो पातेहैं । इसके इलावा, ज्यादा भीड़-भाड़ होने की वजह से भी तुरंत स्तनपान कराने में विलम्ब हो सकता है।”

दूसरी तरफ डॉ कौशिक सामाजिक पहलुओं को भी इसका कारण मानते हैं। उन्होंने कहा, “अगर शिक्षा स्तर कि बात करें तो अनपढ़ महिलाएं अपने नवजात बच्चे को स्तनपान कराने के लिये काफी चिंतित रहती हैं। वहीं दूसरी तरफ, कुछ पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने शारीरिक बनावट को लेकर काफी सचेत रहती हैं और स्तनपान कराने से कतराती हैं।”

जबकि ये सब भ्रांतियाँ हैं और कोई भी कामकाजी महिला स्तनपान करा सकती है। स्तनपान कराने से कोई नुक्सान नही होता है और न ही शारीरिक बनावट पर कोई असर होता है। अपितु स्तनपान माँ के मोटापे को जल्दी खत्म करने में भी मदद करता है। इसके इलावा स्तनपान गर्भाशय को सिकोड़ कर गर्भावस्था से पहले की स्थिति में लाने में भी मदद करता है। इससे जीवन में आगे चलकर टाइप-2 मधुमेह, स्तन कैंसर और डिम्बग्रंथि (ओवेरियन) कैंसर होने का खतरा भी कम रहता है। स्तनपान ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर होना) और कार्डियोवस्कुलर (ह्दय संबंधी) रोगों के खतरे को कम करने में भी मदद करता है।

डॉ कौशिक ने बताया कि प्रदेश के सभी बड़े अस्पतालों में सरकार द्वारा पोषण सलाहकार रखे गये हैं जो नवजात बच्चों के पोषण का ध्यान रखते हैं और माँ को स्तनपान करवाने में प्रशिक्षण देते हैं। उम्मीद है की अगले सर्वेक्षण तक हम प्रदेश के इन् आंकड़ों में बढ़ौतरी ला पाएंगे।

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