लोहड़ी का रंग, छुट्टियों के संग
द्वारा: नितिन
सर्दियाँ आख़िर आ ही गयीं। इस समय रात का एक बजा है और कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है। इस ठण्ड में आख़िर नींद कहाँ आने वाली है। सोचा क्यों न कुछ लिखा जाए। सर्दियाँ आते ही मुझे अपने गाँव कोटगढ़ की याद आती है। बचपन में स्कूल की छुट्टियां सर्दियों में ही होती थी। तो बस स्कूल ख़त्म हुए नहीं के हम सभी बच्चे कोटगढ़ का रुख कर लेते थे। और यह दो महीने पूरे साल के सब से यादगार पल होते थे। दो महीने बस धमाचोक्ड़ी और कुछ नहीं। शिमला की तंग गलियों से निकलकर गाँव के खुले खेत खलिहान खूब भाते थे। साथ में दादा दादी का दुलार जो हमें इन दो महीनों में बिल्कुल बिगाड़ देता था।
हम भाई बहनों की दिनचर्या सुबह सात बजे शुरू होती। उठे और पकड़ लिया बल्ला। नौ बजे तक क्रिकेट खेला जाता। बीच में माँ आकर कई बार खाने के लिए बुलाती पर सुनता कौन था? सुबह की रसोई नौ बजे बंद होती थी इस लिए मन मार कर खाने के लिए आना पड़ता। खाना खाया, स्नान किया और फ़िर चल दिए मैदान की ओर। माँ घर के काम से फारिग होती तो हमारे पढ़ने का समय हो जाता। ग्यारह से एक बजे तक पढ़ाई होती और माँ फिर दिन के खाने में व्यस्त हो जाती। हम लोग दिन का खाना लेकर खेतों में जाते जहाँ दादाजी और बाकी गोरखा कर्मी हमारी राह देख रहे होते। वह लोग खाने में व्यस्त हो जाते और हम उनके औजारों के साथ धींगामुश्ती करते। इस के बाद शुरू होता पेडों पर चढ़ने का खेल। कौन सब से ऊपर वाली डाल पर चढ़ कर दिखलाएगा। जो जीतता उसे गाँव के बाजार भेजा जाता दिन का अखबार लाने और साथ में मिलता एक रुपया बख्शीश।
हम बाकी बच्चे खेतों में चर रही गाय लेकर उनको घर वापिस ले चलते। जेसे ही हम दादाजी की नज़रों से ओझल होते हमारा अपना खेल शुरू हो जाता। कौन गाय के थन से धार मार कर सीधा मुहं में दूध पिएगा। आनन् फानन गाय के लिए घास का प्रभंद किया जाता ताकि वह एक जगह खड़ी रहे। हम लोग बारी बारी गाय का दूध पीते । इस खेल में मेरी मास्टरी थी। हम सब बच्चे लगभग दो किलो दूध पी जाते। घर पहुँचने पर जब गाय को दुहा जाता तो वह दूध कम देती। सब हैरान। रात को जब खाने की बारी होती तो हम सब भूख न होने का बहाना करते। भला दो किलो असली दूध छकने के बाद इस छोटे से पेट में कहाँ जगह बचती थी। उस ज़माने में टेलीविजन नाम की चिड़िया नहीं होती थी। रात के भोजन के बाद दादाजी खँजरी लेकर पहाड़ी गीतें गाते और हम बच्चे नाचते। शायद इस से बेहतर कोई मनोरंजन नहीं हो सकता था। हम तब तक नाचते जब तक थक हार कर वहीँ सो नहीं जाते थे। दादाजी हम सब को बिस्तर पर छोड़ कर आते और अगले दिन फिर वही धमाचोक्ड़ी मचती।
लोहड़ी आती और घर में उत्सव का माहौल बन जाता। पहाड़ों में इसे मकर सक्रांति के नाम से मनाया जाता है और पहाड़ी भाषा में इसे ‘माघ साजा’ कहा जाता है। दादाजी बताते थे कि माघ और ब्राघ राते में ही निकलते हैं याने इस रात को बर्फ गिरती थी। माघ साजा पर घर में कई पकवान बनते। सुबह पाँच बजे उठ कर स्नान होता और मुहं अंधेरे में पाजा के पत्तों के साथ हवन किया जाता। फिर गाँव के मन्दिर में जाकर ग्राम देवता के दर्शन किए जाते थे। वापस आकर माह की खिचडी मिलती और साथ में ढेर सारा घी। हम बच्चे खूब छक कर खिचडी और घी का आनंद लेते। इतना खाने के बाद तो सिर्फ़ आराम ही किया जा सकता था। बाद में बच्चों की टोली जुटती और सब निकल जाते लोहडी मांगने। हमारी जेबें रेव्ड़ी, गच्चक से भर जातीं। कहीं कहीं तो एक या दो रुपये भी मिल जाते। पैसे हम माँ को दे देते और रेव्ड़ी गच्चक संभाल कर रख लेते। भला बचपन में पैसों का क्या मोल? घर पर तब तक पकैन, बड़े, चूरे, संनसे बने होते थे। यानि एक और भोज। अगले दिन यह पकैन आदि घर की बेटियों को उनके ससुराल भेजे जाते जिसे पाओड़ कहा जाता है। यह कम भी हमारे ही जिम्मे आता और हम चल देते दो-तीन दिनों की मेहमानी पर।
अब तो यह सब एक स्वप्न ही लगता है। जीवन की व्यस्तता में वह दिन न जाने कहाँ छूट गये हैं। मैं जब आज के बच्चों के बचपन से अपने बचपन के दिनों की तुलना करता हूँ तो केवल मुस्करा कर रह जाता हूँ।
पेश है दुल्ला भट्टी का वोह गीत जो हम लोहडी पर गया करते थे। उम्मीद है यह अब भी आप सब को याद होगा
सुंदर मुन्द्रिया ..हो
तेरा कौन विचारा ..हो
दुल्ला भट्टी वल्ला ..हो
दुल्ले ने ती विअहियी ..हो
सेर शकर पाई ..हो
कुडी दे बोजे पाई ..हो
शाल्लू कौन समेटे ..हो
चाचा गाली देसे ..हो
चाचे छोरी कुटी ..हो
ज़मिन्दारण लुटी ..हो
ज़मिन्दारा सिदाये ..हो
गिन -गिन पोले लाई ..हो
इक पोला रह गया ..हो
सिपाही फरह के लेई गया ..हो
आखो मुंडाओ ताना ..
मुकी दा दाना ..
आना लेई के जाना
लोहडी और मकर सकरान्ति की अग्रिम शुभकामनाओं सहित आप सब को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
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This was written by NITYIN on Monday, January 12, 2009, 12:14. NITYIN has written 12 posts on this site.













नितिनजी भिरीन. हमारे गाँव में आज के दिन एक दूसरे को "भिरीन" बोलते हैं. सुबह सुबह होड़ लग जाती है कि कौन पहले दूसरे व्यक्ती को भिरीन बोलेगा. इसका शब्दार्थ तो नहीं ज्ञात, परन्तु जहां तक मुझे लगता है यह एक दूसरे को संक्रान्ती की बधाई देने का तरीका है. हम सुबह सुबह मम्मी पापा व दादा दादी को भिरीन बोलते थे और पड़ोस में जा कर भिरीन लगाते थे.
अगर आपके कोटगढ़ में भी ऐसा होता है तो अधिक जानकारी अवश्य दें