चम्बा फर्स्ट: महंदो राम बुनकर की कहानी से समझिए सरकारी योजनाओं का गणित

महंदो की माने तो वह भले ही आधे पेट खायेंगे, परन्तु अपने बच्चों को बुनकरी के व्यवसाय में नहीं आने देंगे

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महंदो राम

रकार द्वारा लघु और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देकर ग्राम स्वरोजगार योजना को सशक्त करने की बात कही जा रही है। लेकिन, ऐसे ज्यादातर उद्योग आज भी अपने लिए माकूल बाज़ार बना नहीं पाए। नतीजा या तो आज बदहाल है या घिसट-घिसट कर चलने को मजबूर है। काम पूरी लगन और मेहनत के साथ करते हैं, लेकिन जो भी उत्पादन करते हैं उसकी इतनी कीमत नहीं मिल पाती है कि इज्जत की ज़िन्दगी जी सकें।

35 साल से बुनकरी के पेशे में परिवार के साथ जुटे महंदो राम की कहानी हम आपको बताएँगे। बाकी सब तय करने का काम हम आप पर छोड़ेंगे।

महंदो राम चम्बा के छत्तराड़ी गाँव के रहने वाले हैं और 35 साल से बुनकरी के पेशे में हैं। वह सरकार द्वारा चलाई जा रही स्वरोजगार योजना में इंस्ट्रक्टर भी  हैं। इंस्ट्रक्टर का खेल आपको बाद में  समझाएंगे, पहले उनके बुनकरी के हालात पर बात करते हैं।

महंदो राम छत्तराड़ी में अपने घर के पास ही एक किराये की दूकान में दो हस्तचालित संयंत्र द्वारा बुनकरी का काम करते हैं। पास में इन्वेस्ट करने को कुछ है नहीं। लिहाजा बिचौलिए के चंगुल में है जो उन्हें ऊन और धागे दे जाता है और वह उसे बुन कर उसे वापस कर देते हैं। बदले में वह उन्हें बुनाई में मजदूरी दे जाता है।

12 घंटे लगातार काम के मिलते है ₹250

महंदो राम ने बताया कि लगातार 12 घंटे तक काम करने पर एक कोट दो दिन में बुनकर तैयार होता है। एक कोट की बुनाई के ₹500 से ज्यादा नहीं मिलते। उन्होने यह भी बताया कि इस दौरान कई ऐसे काम है जिसमे परिवार के अन्य सदस्यों को भी शामिल करना होता है, जिसकी अलग से कोई मज़दूरी नहीं मिलती।

आँखे कमजोर होती जाती हैं

महंदो के मुताबिक़ बुनाई का यह काम बहुत सधे और संजीदा अंदाज में करना पड़ता है। एक भी बार पैटर्न मिस हो जाए तो पूरे के पूरे कपड़े का डिजाईन खराब हो जाता है। इसके बदले महाजन से डांट अलग मिलती है। मज़दूरी तो दूर की बात है। इस तरह के काम में आँखों का मजबूत होना जरुरी है, लेकिन वक़्त के साथ-साथ इस काम में आँखें कमजोर होती जाती है, जिसके बाद बुनकरी का काम भी नहीं किया जा सकता है। नतीज़न इंसान न यह काम करने लायक बचता है, न कोई और।

किस्मत में ही मजदूर बन कर रहा जाना

महंदो राम ने बताया कि उन्होंने कई बार ऊन और धागे खरीद कर खुद से यह व्यवसाय करना चाहा लेकिन नुकसान ही उठाना पड़ा। उनके मुताबिक़ एक कोट पर धागे का खर्च, ₹1,000 तक पड़ता था और कीमत ₹1,500 से ज्यादा कभी नहीं मिली।

ऊन और धागे खरीदने के चक्कर में बाज़ार और भागना पड़ा। जिससे नुकसान ही हुआ। लिहाज़ा, किस्मत में ही मजदूरी करना मानकर उन्होंने अपनी कोशिशें बंद कर दी और महाजन के काम पर जिन्दगी काट रहे रहे हैं।

मजदूरी के लिए भी करना पड़ता है लंबा इंतज़ार

महंदो के मुताबिक़, महाजन उन्हें धागे दे जाता है। वह उसे पूरे परिवार के साथ मिलकर दिन रात एक कर बुनते हैं, लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि वह महाजन बुने कपड़े लेनें सालों बाद आता है। जब वह कपड़े ले जाता है तब उन्हें उसके बदले पैसे मिलते हैं।  महंदो ने बताया कि अभी तक कई ऐसे कपड़े हैं जो दो-दो साल से बुन कर रखें हैं, लेकिन उसे अभी महाजन ले ही नहीं गया है।  जब वह उसे ले जाएगा तब जाकर कहीं उसे उसकी बुनाई मिलेगी।

सरकारी योजनाएँ भी निकली सियासी :जिसमें खोना ज्यादा पाना कम

इंस्ट्रक्टर वाली बात को अब आगे बढ़ाते हैं। महंदो राम हेंडीक्राफ्ट विभाग द्वारा स्वरोजगार योजना द्वारा चलाई जा रहे प्रशिक्षण योजना में इंस्ट्रकटर भी हैं। एक साल के लिए संविदा पर प्रशिक्षण देने के बदले उन्हें ₹5,000 का निश्चित मानदेय मिलता है, अब उस मानदेय की कहानी भी जरा तफसील से समझिये।

मजदूरी भर भी नहीं है मानदेय की धनराशि

महंदो राम को भी बाकी इंस्ट्रक्टर जैसे ₹5,000 मिलते हैं। इसके बदले, उन्हें दूर दूर जाकर लोगों को प्रशिक्षण देना पड़ता है।  जहाँ खुद के पैसे से आने, जाने, खाने पीने रुकने सब की व्यवस्था करनी पड़ती है।

अब अगर महीने 25 दिन भी माने जाएँ तो उस हिसाब से उनकी मज़दूरी होती है ₹200। अगर उसमे से उनके दिन के बाकी खर्च जो उनके काम के दौरान होते है उसे ₹80 भी माने जाएँ तो उनके हिस्से आते हैं सिर्फ ₹120 प्रतिदिन, जिसकी कुल जमा कीमत महीने में ₹3,600 से ज्यादा नहीं है।

बच्चों को नहीं आने देंगे भले आधे पेट खायेंगे

महंदो की माने तो वह भले ही आधे पेट खायेंगे, तो भी अपने बच्चों को पढ़ाएंगे और उन्हें इस व्यवसाय में नहीं लायेंगे। वह अपने बच्चों को एक नया भविष्य देने की हर कोशिश करेंगे।

स्किल लेबर का एक तिहाई भी नहीं मिलता है

सरकार द्वारा निश्चित स्किल लेबर की धनराशि का एक तिहाई भी सरकार द्वारा संचालित इन योजनाओं में ऐसे लोगों को नहीं मिल रहा है। जबकि वोट बैंक के नाम पर बुनकरों के हित के लिए कई योजनाये केंद्र और प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं। विशेष पैकेज भी दिए जा रहे है। लेकिन वह इन तक पता नहीं कैसे नहीं पहुँच पा रही है।

दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियाँ और बात आप पर:
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
हमें मालूम हैं पानी कहाँ ठहरा होगा।।

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भारत सरकार द्वारा चम्बा को पिछड़े जिलों की सूची में शामिल किये के जाने के बाद, से चम्बयालों द्वारा चम्बा रीडिस्कवर जैसे अभियान यहाँ की सिविल सोसाइटी द्वारा चलाये जा रहे हैं। उनके इस अभियान में हिमवाणी भी चम्बा फर्स्ट (#ChambaFirst) नामक अभियान चलाकर कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रहा है।

यह लेख #ChambaFirst (चम्बा फर्स्ट) अभियान के तहत लिखा गया है। इस अभियान के तहत हम आप तक चम्बा के अलग अलग पहुलओं को लाते रहेंगे। हमारा प्रयास रहेगा की हम जनता के विचार एकत्रित कर, चम्बा को पिछड़ेपन के खिताब से मुक्त कराने हेतु, रीडिसकवर चम्बा के साथ मिल कर एक श्वेत पत्र लाएं जिसमें चम्बा के विकास के लिए विचार प्रस्तुत होंगे।

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