सरबजीत सिंह उर्फ़ ‘वेला बॉबी’ की 6 मार्मिक कहानियाँ जो दिल को दहला देती हैं

जीवन की कुछ घटनाएँ बताने योग्य होती हैं, जो हमें याद दिला सके कि ये शरीर जिस पर हम इतना घमंड करते हैं वह नश्वर है और मृत्यु ही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है

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सरबजीत सिंह उर्फ़ 'वेला बॉबी' शव वाहन के साथ

भावनाएँ जैसे क्रोध, प्रेम, डर, हर्ष, अनुभव आदि मनुष्य जीवन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये भावनाएं ही तो हैं जिस कारण युवराज सिद्धार्थ महात्मा बुद्ध बन गए । यह उत्प्रेरण ही तो था जिसकी वजह से महान अशोक ने कलिंग मे अपनी तलवार फेंक कर सत्य अहिंसा और अस्तेय जैसे हथियार उठा दुनिया मे शांति फैलाने का बीड़ा उठाया ।

इसी तरह की प्रेरणा लिए, असमर्थ और ज़रुरतमंद लोगों के जीवन की कठिनाइयों को कम करने का काम सरबजीत सिंह उर्फ़ बॉबी कर रहे हैं । रोज़ सुबह उठ कर जब हम अपने काम का ब्यौरा बनाते हैं तो उस समय सरबजीत सिंह कई बार शिमला में मृत लोगों के शवों को श्मशान या परिजनों तक पहुंचा रहे होते हैं। हर शाम सैकड़ों की संख्या मे इन्दिरा गाँधी मेडिकल कॉलेज में एडमिट कैंसर पीड़ितों के खाने-पीने और उनकी दवाइयों के इंतज़ाम मे जुट जाते हैं। उनका पूरा दिन ज़रूरतमंदों की सेवा में बीतता है। उनके इस काम की सबसे बड़ी बात यह है कि वे इसके लिए किसी मरीज़ या उसके परिवार से कोई पैसे नहीं लेते है ।

पेशे से लोअर बाज़ार शिमला में जूते की दुकान चलाने वाले सरबजीत सिंह बॉबी का जीवन भी पहले आम लड़कों जैसे ही था। लेकिन सेवा भाव से खाली समय मे मृतशव वाहन चलाते समय उनके साथ एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ घटी कि इस काम को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। यहाँ हम सरबजीत सिंह के साथ बीती कुछ ऐसी मार्मिक घटनाएँ, उन्हीं की ज़ुबानी पेश कर रहे हैं जिनसे किसी का भी दिल पसीज जायेगा।

“गाड़ी चलाने में मुझे बहुत रूचि थी, मैने मृतशव वाहन चलाना इसलिए शुरू किया, क्योंकि इसे शिमला के प्रतिबंधित जगहों पर भी चलाया जा सकता था। परन्तु, मेरे साथ हुई कई घटनाओं ने मुझे रातों में सोने नहीं दिया, और तब मुझे एहसास हुआ कि यह काम कितनी बड़ी समाज सेवा है।”

वो चीखें आज भी गूँजती है कानों में

“शुरुआती समय में एक दिन मुझे शिमला के रिप्पन अस्पताल से फ़ोन आया की यहाँ एक नौ वर्षीय बच्चे की मृत्यु हो गयी है और उसे खलीनी पहुंचाना है । जब मैंने उस बच्चे के शव को अपनी वैन में रखा और जिस तरह से उसकी माँ चीखी, वो चीखें आज भी मेरे कानों में गूंजती हैं।

“उसकी माँ ने मुझे रोते हुए बताया कि तीन दिन तक वह अशिक्षित होने के करण इधर-उधर भटकती रही पर कोई जाँच नहीं हुई और कोई पूछने तक नहीं आया; और जाँच के अभाव मे उस बच्चे की मृत्यु हो गयी। रास्ते भर में उसकी माँ अपने दो बच्चों के साथ लाश से लिपट कर चीख रही थी।

“उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं कौन सी सेवा कर रहा हूँ। उस घटना ने मुझे पूरी तरह विचलित कर दिया और मैं रात भर सो न सका।

“मैं सोचने लगा कि ऐसे ना जाने कितने लोग होंगे जिनकी सहायता के लिए कोई नहीं है। यहीं से मुझे एक उद्देश्य मिला कि मैं ऐसे लोगों के काम आऊँ।”

जब 48 घंटे बाद मिला हिंदुओं का कब्रिस्तान

“दूसरी घटना उस समय की है जब मुझे शिमला के इंदिरा गाँधी मेडिकल कॉलेज से सूचना आई कि एक मज़दूर का शव है, जिसे दफ़नाना है। मज़दूर की पत्नी ने बताया कि है तो वो हिन्दू, परन्तु उसको दफ़नाना है। वो राजस्थान की किसी एक ऐसी जाति के थे जिनमें हिन्दुओं को दफ़नाया जाता है। शव वाहन में मैं पूरे दिन उसके क्षत-विक्षत शव के साथ और उसकी भूखी प्यासी पत्नी और दो बिलखते बच्चों के साथ पूरे शिमला में भटकता रहा, लेकिन कोई भी हिंदुओं का कब्रिस्तान नहीं मिला। शाम को किसी ने बताया कि टूटू में ऐसी जगह है। मैं शव वाहन लेकर वहां पहुँचा। लेकिन, रात होने तक कोई भी उस जगह के बारे में नहीं बता पाया। आखिरकार बिना दफनाए मुझे शव लेकर वापिस अस्पताल आना पड़ा। अगले दिन बड़ी मशक्कत के बाद मैं वह जगह टूटू में ढूंढ पाया और उस शव को दफ़ना सका। इस घटना के बाद यह समझ में आया कि यहाँ पर बहुत सी चीजों को लेकर लोगों को जानकारी नहीं है । मैंने लोगों को उस जगह के बारे में भी बताया, जिससे आगे चलकर किसी को मेरी तरह परेशान न होना पड़े।”

उस रात की सुबह न थी

“उस रात को शाम 11 बजे से लेकर सुबह 8 बजे तक मैंने एक के बाद एक, चार शवों को उनके घर पहुँचाया। मैं एक शादी में गया हुआ था। और मुझे एक फोन कॉल आ गई कि एक शव को उसके घर पहुँचाना है। शादी से निकल ही रहा था कि एक और शव के लिए कॉल आ गई। तीसरी कॉल रात को आई। मैं सुबह 7 बजे सोने जा ही रहा था कि जिस शादी में मैं पिछली शाम गया हुआ था, उनके घर से कॉल आ गई कि उनके परिवार में किसी बुज़ुर्ग की मृत्यु हो गई। न जाने वो कैसी रात थी कि रात ग्यारह बजे से शवों को ढोने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वह अगले दिन आठ बजे तक चलता रहा। वो ऐसी रात थी जिसकी कभी सुबह ही नही हुई। उस रात मैंने लोगो के दर्द को बहुत नज़दीक से महसूस किया।”

जब कैंसर की सही स्पेलिंग न लिखने पर बना मज़ाक

“कैंसर के पीड़ितों को हॉस्पिटल में खाने पीने और चाय के लिए भटकता देख मैंने वहां पर एक लंगर चलाने की योजना बनाई। लंगर की अनुमति के लिए जब मैंने आवेदन दिया तो उस आवेदन पत्र पर मैंने cancer को canser लिखा था। स्पेलिंग की इस गलती पर संबंधित अधिकारियों ने मेरी खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि जिसे कैंसर लिखना भी ठीक से नहीं आता वह क्या लंगर चलाएगा। उनकी यही बात मुझे अखर गई। उनकी इस बात ने मेरे इरादों को और भी मजबूत किया और तब से आज तक यह लंगर, भगवान की कृपा से अनवरत चल रहा है।”

अमीशा की मुस्कान रहेगी सदा याद

कैंसर से पीड़ित बच्ची अमीशा के साथ सरबजीत सिंह

कैंसर से पीड़ित बच्ची अमीशा के साथ सरबजीत सिंह

“लंगर चलाते समय मैंने इस बात को महसूस किया कि अस्पताल में आने वाले मरीजों में छोटे बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। मैं इसी लंगर में एक अमीशा नाम कि बच्ची से मिला था। उसकी उम्र लगभग 4 वर्ष कि थी । वह किन्नौर की रहने वाली थी। वह बच्ची कैंसर से ग्रसित थी। उसके पिता उसे 6 महीने से लगातार अपनी पीठ पर उठा कर उसे उपचार के लिए ला रहे थे। कीमोथेरेपी का दर्द सहने के बावजूद भी वह बच्ची जब भी मुझे देखती थी तो हल्का सा मुस्कुरा देती थी। उसकी वह मासूमियत भरी मुस्कान मेरे हृदय में घर कर गयी। मैंने 2 वर्ष कि उम्र के बच्चों को भी इस पीड़ा से गुज़रते हुए देखा है ।

“इस कैंसर अस्पताल को अगर आप कभी देख लें तो डर जाएं क्यूंकि वो जगह किसी कब्रिस्तान से कम नहीं है।”

नेपाली मूल की बच्ची का दाह संस्कार

“एक दिन जब मैं शवों को हॉस्पिटल से लेने आया था, तो मैंने दो नेपाली मूल की महिलाओं को एक छोटे बच्चे को लेकर डॉक्टर के साथ एम आर आई के लिए ले जाते देखा। दोनों रोते हुए जा रही थीं और बच्चे को डॉक्टर ने उठा रखा था। शाम को मैंने पाया कि वह दोनों महिलाएं लंगर खाने आईं। मेरे पूछने पर उन में से एक महिला, जिसका नाम गीता है, ने बताया कि उसकी बहन सीता, एक महीने पहले ही नेपाल से अपनी बच्ची को लेकर कोटगढ़ आई थी, पर कुछ दिनों पहले ही बच्ची को बुखार हो गया था।

“दवाइयाँ देने पर वह कोमा में चली गयी और वह सातवाँ दिन हो गया था, और अब तक दो बार एम आर आई और एक्स-रे हो चुके हैं। लेकिन अभी तक बच्ची की हालत में कोई सुधार नहीं था। उनकी समझ और जो उन्हें डॉक्टर ने बताया वह यह था कि बच्ची के दिमाग में पानी भर गया है।

“उसी हालत में रहने के लगभग 10 दिन बाद, बच्ची की मृत्यु हो गयी। मुझे उनके दाह संस्कार के रीति-रिवाज़ों का पता नहीं था। उसकी माता सीता ने केवल एक ही बात बताई कि उनके धर्म में बिना कपड़ो के ही बच्चों का दाह संस्कार किया जाता है। मैंने अरदास पढ़ कर उस बच्ची को दफनाया। आधे घंटे बाद उसकी माँ मेरे साथ लंगर सेवा में शरीक हो गई।

सरबजीत सिंह की समाज सेवा व उनके NGO ऑलमाइटी ब्लेस्सिंग्स के चर्चे — चाहे वो शव ढोना हो, या कैंसर अस्पताल में लंगर, या रोटी बैंक या रक्त दान शिविर — केवल हिमाचल में ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में विख्यात हैं। उन्हें ‘वेला बॉबी’ के नाम से भी जाना जाता है।

वे करीब 12 वर्षों से शव सेवा कर रहे हैं और अब तक करीब 2,000 से भी ऊपर शव ढो चुके हैं। उनका कहना है कि उन्हें शवों से डर नहीं लगता। “डर लगता है तो ज़िंदा इन्सानों से जो मज़हब, जात-पात और रंग-भेद पर लड़ते रहते हैं और मरने मारने पर उतारू रहते हैं।”

हिमवाणी, सरबजीत सिंह के इस सेवा-भाव को सलाम करता है। 

सभी चित्र साभार: सरबजीत सिंह