चंबा फर्स्ट: ‘चाय पर चंबा की चर्चा’ में छलका चमब्याल का दर्द; बोले राजनेताओं ने पीछे धकेला

हिमवाणी ने भी चम्बा फर्स्ट नामक अभियान शुरू किया है, जिसके तहत हम पाठकों को चम्बा के अलग अलग पहलुओं से अवगत कराएँगे।

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मनुज शर्मा (बाँए) कुलभूषण उपमन्यु के साथ

भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट में हिमाचल के चंबा जिले को देश के 115 पिछड़े ज़िलों की तालिका में नाम आने से चम्बयाल काफी आहत हैं। इस पूरे प्रकरण पर चंबा के प्रबुद्ध जनों द्वारा वीरवार को जिला मुख्यालय के राजा भूरि सिंह सभागार में ‘चंबा फर्स्ट’ और ‘रीडिस्कवर चंबा’ के मंच के नीचे एक अधिवेशन का आयोजन किया गया। जिसमे चंबा के प्रबुद्ध जन, व्यवसाई, समाजशास्त्री, शिक्षा विद और समाज सेवी इकठ्ठा हुए और चंबा के वर्तमान अतीत और भविष्य का स्वरूप कैसा हो इस विषय पर चर्चा हुई। अधिवेशन के दौरान आये लोगों ने एक सुर में कई सवाल किए: हम ऐसे तो नहीं थे, हमारी ऐसी कभी पहचान नहीं थी, लेकिन आज हमारी स्थिति क्या हो गयी है? सभी ने चंबा के पिछड़ेपन का कारण राजनैतिक विजन का अभाव बताया। अधिवेशन में पांच अलग-अलग समितियां बनाकर समेकित विकास के लक्ष्य को हासिल करने की कार्ययोजना भी बनाई गयी।

चम्बा फर्स्ट के 7 सुर:

इस कार्यक्रम का संचालन समाजसेवी मनुज शर्मा ने किया और मुख्य अतिथि रहे कुलभूषण उपमन्यु और पद्मश्री से सम्मानित विजय शर्मा। मनुज शर्मा ने हिमवाणी से बातचीत में बताया कि इस अधिवेशन द्वारा चम्बा के लिए 7 ‘स’ की मांग उठा रहे हैं। ये 7 ‘स’ हैं: सड़क, सुरंग, शिक्षा, स्वरोज़गार, स्वास्थय, संस्कृति और संपर्क।

इसी के साथ हिमवाणी ने भी चंबा को पिछड़ेपन के कलंक से मिटाने के लिए ‘चंबा फर्स्ट’ नाम से अभियान शुरू किया, जिसके तहत, हिमवाणी अपने पाठकों को चम्बा के अलग अलग पहलुओं से परिचित कराएगा। इस अभियान द्वारा — चम्बा ज़िले में कैसे विकास लाये जाए के लिए — एक श्वेत पत्र भी ज़ारी किया जायेगा।

अधिवेशन में चंबा भर से आये लोगों ने चंबा को फिर से उसके गौरवशाली अतीत तक पहुंचाने का प्रण भी किया। इस दौरान विदेशों में रह रहे दर्जनों चंबा वासियों ने इन्टरनेट के माध्यम से अधिवेशन में अपनी बातें रखीं। इस दौरान लोगों ने चंबा के सर्वांगीण विकास में सभी संभव सहयोग देने का आश्वासन भी दिया।

बिना चंबा के नहीं बन पाता हिमाचल

अधिवेशन में समाजसेवी और चिपको आन्दोलन के अगुआ नेताओं में शामिल रहे कुलभूषण उपमन्यु ने कहा कि बिना चंबा के हिमाचल गठन मुमकिन नहीं था। चंबा के विलय के बाद ही हिमाचल के स्वतंत्र राज्य के निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया।उन्होंने कहा:

“गौरवशाली अतीत का साक्षी रहा चंबा आज अपने दुर्गति के कारण जाना जा रहा है और उसकी हम चर्चा कर रहे हैं। जहाँ हिमाचल की प्रति व्यक्ति आय डेढ़ लाख से ज्यादा है, वहीं चंबा का आंकड़ा रुपये 23,000 है, जबकि आज भी चंबा में 54% से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे है।”

सबसे पहले बिजली बनाकर भी हम आज सबसे पिछड़े हैं

चित्रकार और पद्मश्री से सम्मानित विजय शर्मा ने चंबा के इतिहास के बारे में बताते हुए कहा कि चंबा ने 1908 में बिजली बना ली थी, लेकिन आज हम पिछड़े जिलों में शुमार हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह राजनीति का निकम्मापन है। उन्होंने कहा कि चंबा में एक से बढ़कर एक मंदिर हैं, लेकिन ज्यादातर मंदिरों के अपने एक सराय तक नहीं है जहाँ आकर लोग रुक सकें और चंबा में घूम फिर सकें। जबकि बाक़ी जिलों में जो छोटे छोटे मंदिर भी हैं वहां जरुरत से ज्यादा चीजें है। उन्होंने कहा कि हमें चंबा के हित की बात करनी चाहिए लेकिन लोग अपने अपने क्षेत्र के बाहर की बात नहीं कर रहे हैं।

चंबा अपार संभावनाओं की भूमि है

ट्रैकिंग पर्यटन की शुरुवात करने वाले प्रेम सागर ने कहा कि हम अपने अतीत और सांस्कृतिक धरोहरों के रूप में अपने चंबा को बताये। हम टीबी वार्ड को सीतामढ़ी के वास्तविक नाम से बुलायेंगे तो उसमे हमें आपनी संस्कृति और भारतीयता दिखेगी। उन्होंने आगे कहा की चंबा अपार संभावनाओं की भूमि है। बस इसके सही इस्तेमाल की जरुरत है। हम चंबा आने वाले पर्यटकों को इस तरह की हॉस्पिटैलिटी दें कि पर्यटक यहाँ और रुकना चाहे।

शिक्षा पर हो हमारा फोकस

शिक्षाविद उमेश राठौर ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी ताकत शिक्षा है। अगर हम शिक्षित बन जायेंगे, समर्थ बन जायेंगे, तो हमारे अन्दर वह जागरूकता आ जायेगी जिससे हम अपने हित की बातें समझ सकें और अधिकार के लिए लड़ सकें। अगर हमारे बीच से कोई बड़ा अधिकारी बनेगा तो वह हमारे हित के बारे में सोचेगा और विकास की योजनाओं को चंबा में ला सकेगा।

शिक्षा पद्धति में हो बदलाव

शिक्षिका रजनी शर्मा ने कहा कि हमे अपने छात्रों को चंबा के समृद्ध इतिहास के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए, जिससे हम अपने स्वर्णिम इतिहास के बारे में जान सकें।

हम सिर्फ चमब्याल बने

विभिन्न भोगोलिक और राजनैतिक क्षेत्रों में बंटकर असंगठित सा दिखने वाला चंबा आज उसके पिछड़ेपन की एक वजह है।

हम खुद को चमब्याल कम, खुद को गद्दी, भरमौरी, पंगवाल, चुराही, बटियात जैसे छोटे क्षेत्रों में बंटे हुए है। हमें आगे बढ़ने के लिए सिर्फ चमब्याल बनना पड़ेगा, तभी हम संगठित होकर अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकेंगे।

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