हनोल: प्रकृति का एक अनोखा नजारा

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द्वाराः नितिन

आज में आपको हिमाचल प्रदेश से सटे उत्तराखंड राज्य में स्थित हनोल नामक छोटे से गाँव के बारे में बताता हूँ। यह गाँव रोहड़ू से करीबन दो घंटे की दूरी पर है। रोहड़ू से आप सावड़ा (सरस्वती नगर) अथवा हाटकोटी होते हुए कुड्डू पर हिमाचल प्रदेश की सीमा पार करके उत्तराखंड राज्य में प्रवेश करते हैं। समरकोट होते हुए आप त्यूणी पहुँचते हैं। त्यूणी से तौंस नदी पार करके इस राज्य के उत्तरकाशी जिले में प्रवेश करते हैं। यह एक मनमोहक यात्रा है। रोहडू से त्यूणी तक पब्बर नदी का नज़ारा बड़ा ही रमणीय है। रास्ते में पब्बर नदी तौंस में मिल जाती है। हालाँकि यह मार्ग बीच बीच मैं ऊबड़ खाबड़ भी है। त्यूणी से पैंतालीस मिनट की दूरी पर हनोल स्थित है।

त्यूणी से आगे कई छोटे छोटे गाँव हैं और यहाँ का नज़ारा भी देखते ही बनता है। दूर बहती रूपन और सूपन नदियाँ एक अलग ही छटा भिकेरती हैं। हनोल, महासू देवता के मन्दिर के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध है। पहले जिला शिमला, सोलन और सिरमौर को महासू के नाम से जाना जाता था। बाद में राज्यों के बँटवारे के बाद यह क्षेत्र पहले उत्तर प्रदेश और अब उत्तरांचल राज्य का हिस्सा बन गया।

महासू देवता का मन्दिर बिल्कुल पहाड़ी शैली में बना है। मुख्य सड़क से नीचे उतर कर आप महासू मन्दिर के आँगन में प्रवेश करते हैं। इस मन्दिर की वास्तु कला देखते ही बनती है। मुख्य मन्दिर में महिलायों का प्रवेश वर्जित है। देवता जी के दर्शन के लिए कपाट खुलवाने पड़ते हैं। लोग दूर दूर से अपनी मन्नत मांगने यहाँ आते हैं। जैसा की पहाड़ों में प्रथा है मन्नत पूरी होने पर देवता जी को बकरे की बलि देनी होती है। अब यहाँ हालाँकि जिन्दा बलि नहीं दी जाती है। महासू देवता की मान्यता केवल उत्तराखंड में ही नहीं, अपीतु हिमाचल में भी है।

हनोल में २-३ सिक्के के काफी भारी गोले हैं, जो कि दोनों हाथों में उंगलियाँ फसा कर ही उठाये जा सकते हैं। वे अहम् का प्रतीक हैं। अगर आप अपने अहम् को काबू में रखें और सूझ भूझ से इन गोलों को उठा सकते हैं। आप इन गोलों को तस्वीर में भी देख सकते हैं।

यहाँ आने के लिए आपको शिमला से पहले रोहड़ू अथवा हाटकोटी आना पड़ेगा। रात यहाँ रुकने के बाद, आप सुबह हनोल के लिए सीधी बस ले सकते हैं। दोपहर में यही बस वापस रोहड़ू आती है। यदि आप हनोल रात रुकना चाहते हैं तो शिमला से सुबह नौ बजे शांकरी के लिए बस पकड़िये। यह बस शाम पाँच बजे हनोल पहुँचती है।

यहाँ पर ठहरने का भी उचित प्रबंध है। गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा संचालित एक यात्री निवास यहाँ उपलब्ध है। अथवा, यहाँ पर छोटे छोटे ढाबे भी बिस्तर रखते हैं और आप किराये पर इन ढाबों में भी रात बिता सकते हैं। परन्तु काफी लोग, देवता के मन्दिर में रात लगाने आते हैं, और मन्दिर के पराँगण में ही रात बिताते हैं। अगर आपकी भी ऐसी कोई इच्छा हो तो, अपने साथ कम्बल व चादर ले जाना न भूलें।

इस जगह पर अभी मोबाइल फ़ोन की घंटी बजनी शुरू नहीं हुई है। इसलिए भी यह जगह आप को सुकून के पल दे सकती है।

वापसी में आप त्यूणी से लाल चावल की खरीदारी कर सकते हैं। अपने लाल रंग की विशेषता लिये, रूपन नदी से सींचे, यह चावल आप को शायद ही कहीं और मिलें। यह स्वास्थ्य के हिसाब से भी अत्यन्त गुणकारी हैं। धान की नई फसल नवम्बर में आती है। वैसे भी चावल जितना पुराना हो उतना अच्छा रहता है।

यह पूरा क्षेत्र अभी भी शहरों की अपेक्षा दस साल पीछे का जीवन जी रहा है। यदि आप कोई मन्नत मांगना चाहते हैं या फिर कुछ दिन शहरी जीवन से नाता तोड़ कर प्रकृति के कुछ अनछुये नजारों का आनंद लेना चाहते हैं तो यहाँ जरूर आयें।